अर्पित गुप्ता
जम्मू-कश्मीर में धारा-370 और 35-ए समाप्त होने के बाद ठिठकी हुई राजनीतिक प्रक्रिया शुरू होने के सुखद संकेत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिल्ली में बुलाई बैठक में मिल गए हैं। क्योंकि बैठक से बाहर निकलने के बाद भाजपा
समेत सभी राजनीतिक दलों के प्रमुखों का कहना था कि बैठक अत्यंत सौहार्दपूर्ण वातावरण में संपन्न हुई है। यह
सौहार्द कश्मीर का भविष्य उज्ज्वल करने का मार्ग प्रशस्त करेगा। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री अमित शाह ने इस
बहुदलीय बैठक में भरोसा जताया कि जम्मू-कश्मीर में परिसीमन के बाद विधानसभा चुनाव कराए जाएंगे और
हालात सामान्य होने पर पूर्ण राज्य का दर्जा भी दे दिया जाएगा। साफ है, चुनाव के बाद सरकार किसी की भी बने
घाटी का बहुलतावादी चरित्र उभरेगा और सर्वांगीण विकास का सिलसिला शुरू हो जाएगा। नरेंद्र मोदी ने कहा कि
जम्मू-कश्मीर के युवाओं को राजनीतिक नेतृत्व देकर उनकी आकांक्षाएं पूरी करनी है। ऐसा होता है तो जमीनी स्तर
पर लोकतंत्र मजबूत होगा और जम्मू-कश्मीर तथा दिल्ली के बीच दिल की दूरी कम होगी।
जम्मू-कश्मीर में हाल ही में हुए जिला विकास परिषद् के चुनाव में पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस समेत गुपकार
गठबंधन के दलों ने भले ही अनुच्छेद-370 की वापसी की बात उठाई हो, लेकिन सच्चाई है कि अब इसकी वापसी
दूर की कौड़ी है। इसीलिए बैठक में नेशनल कांफ्रेंस के नेता फारूख अब्दुल्ला ने साफ कर दिया कि 'वह कोई भी
गैर-कानूनी कदम नहीं उठाएगी, जो भी लड़ाई लड़नी होगी वह संविधान के दायरे में होगी।' वैसे भी 370 का मामला
सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है, इसलिए उस पर चर्चा का कोई फिलहाल नतीजा निकलने वाला नहीं है। इसकी
वापसी इसलिए भी संभव नहीं है, क्योंकि यह एक अस्थाई अनुच्छेद था और बीते दशकों में इसके अनेक प्रावधान
खत्म भी कर दिए गए हैं। जवाहरलाल नेहरू भी इसके पक्ष में नहीं थे, इसलिए उन्होंने कहा भी था, कि यह घिसते-
घिसते स्वयं घिस जाएगा। सरदार पटेल और संविधान निर्माता डॉ अंबेडकर भी इसके पक्ष में नहीं थे। प्रधानमंत्री
लाल बहादुर शास्त्री ने भी इसे हटाने की कोशिश की थी।
लिहाजा इसको हटाने की बात करने वाले नेता दिन में स्वप्न देख रहे हैं। हालांकि पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती अभी
भी इसे हटाए जाने का राग अलाप रही है। कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने इन मुद्दों के अलावा कश्मीरी पंडितों
की सुध लेते हुए कहा कि 'वे 30 साल से विस्थापन का दंश झेल रहे हैं, इसलिए जम्मू-कश्मीर के प्रत्येक दल की
जिम्मेवारी है कि उन्हें वापस लाया जाए और उनका सम्मानजनक पुर्नवास हो।' याद रहे 1979-90 में घाटी में
आतंक का उफान आया और दो-तीन दिन के भीतर ही करीब पांच लाख कश्मीरी पंडित, सिख, जैन और बौद्ध
समुदाय के लोगों को खदेड़ दिया गया था। जो आज भी दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। इस कठिन परिस्थिति में
फारूख अब्दुल्ला संकट से मुंह मोड़कर लंदन प्रवास पर चले गए थे। अतएव जब तक इन विस्थापितों का पुर्नवास
नहीं होगा, तब तक न तो कश्मीर में बहुलतावादी चरित्र सामने आएगा और न ही अनुच्छेद-370 खत्म होने का
कोई अर्थ रह जाएगा। इस लिहाज से आजाद ने विस्थापितों का सवाल सभी दलों के समक्ष उठाकर कश्मीर के मूल
चरित्र को स्थापित करने की बात कही है।
जम्मू-कश्मीर के विभाजन और विधानसभा सीटों के विभाजन संबंधी पुनर्गठन विधेयक-2019, 31 अक्टूबर 2019
को लागू कर दिया गया था। इसके लागू होने के बाद इस राज्य राज्य की भूमि का ही नहीं राजनीति का भी भूगोल
बदलेगा। इसके साथ ही विधानसभा सीटों के परिसीमन के जरिए राजनीतिक भूगोल बदलने की तैयारी अब
बहुदलीय बैठक के बाद शुरू हो जाएगी। नए सिरे से परिसीमन व आबादी के अनुपात में जम्मू-कश्मीर की नई
विधानसभा का जो आकार सामने आएगा, उसमें सीटें घट अथवा बढ़ सकती हैं। बंटवारे के बाद जम्मू-कश्मीर और
लद्दाख केंद्र शासित राज्य हो गए हैं। दोनों जगह दिल्ली व चंडीगढ़ की तरह की तरह मजबूत उप राज्यपाल सत्ता-
शक्ति के प्रमुख केंद्र के रूप में अस्तित्व में आ गए हैं। लद्दाख में विधानसभा नहीं होगी। परिसीमन के लिए
आयोग का गठन किया जाएगा। यह आयोग राजनीतिक भूगोल का अध्ययन कर रिपोर्ट देगा। आयोग राज्य के
विभिन्न क्षेत्रों में मौजूदा आबादी और उसका लोकसभा एवं विधानसभा क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व का आकलन करेगा।
साथ ही राज्य में अनुसूचित व अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों को सुरक्षित करने का भी अहम्
निर्णय लेगा। परिसीमन के नए परिणामों से जो भौगोलिक, सांप्रदायिक और जातिगत असमानताएं हैं, वे दूर होंगी।
नतीजतन जम्मू-कश्मीर व लद्दाख क्षेत्र नए उज्ज्वल चेहरों के रूप में पेश आएंगे।
जम्मू-कश्मीर का करीब 60 प्रतिशत क्षेत्र लद्दाख में है। इसी क्षेत्र में लेह आता है, जो अब लद्दाख की राजधानी
हैं। यह क्षेत्र पाकिस्तान और चीन की सीमाएं साझा करता हैं। लगातार 70 साल लद्दाख, कश्मीर के शासकों की
बद्नीयति का शिकार होता रहा है। अब तक यहां विधानसभा की मात्र चार सीटें थीं, इसलिए राज्य सरकार इस क्षेत्र
के विकास को कोई तरजीह नहीं देती थी। लिहाजा आजादी के बाद से ही इस क्षेत्र के लोगों में केंद्र शासित प्रदेश
बनाने की चिंगारी सुलग रही थी। अब इस मांग की पूर्ति हो गई है। इस मांग के लिए 1989 में लद्दाख बुद्धिस्ट
एसोशिएशन का गठन हुआ और तभी से यह संस्था कश्मीर से अलग होने का आंदोलन छेड़े हुए थी। 2002 में
लद्दाख यूनियन टेरेटरी फ्रंट के अस्तित्व में आने के बाद इस मांग ने राजनीतिक रूप ले लिया था। 2005 में इस
फ्रंट ने लेह हिल डवलपमेंट काउंसिल की 26 में से 24 सीटें जीत ली थीं। इस सफलता के बाद इसने पीछे मुडकर
नहीं देखा। इसी मुद्दे के आधार पर 2004 में थुप्स्तन छिवांग सांसद बने। 2014 में छिवांग भाजपा उम्मीदवार के
रूप में लद्दाख से फिर सांसद बने। 2019 में भाजपा ने लद्दाख से जमयांग सेरिंग नामग्याल को उम्मीदवार
बनाया और वे जीत भी गए। लेह-लद्दाख क्षेत्र अपनी विषम हिमालयी भौगोलिक परिस्थितियों के कारण साल में
छह माह लगभग बंद रहता है। सड़क मार्गों व पुलों का विकास नहीं होने के कारण यहां के लोग अपने ही क्षेत्र में
सिमटकर रह जाते हैं।
जम्मू-कश्मीर में अंतिम बार 1995 में परिसीमन हुआ था। राज्य का विलोपित संविधान कहता था कि हर 10 साल
में परिसीमन जारी रखते हुए जनसंख्सा के घनत्व के आधार पर विधान व लोकसभा क्षेत्रों का निर्धारण होना
चाहिए। परिसीमन का यही समावेशी नजारिया है। जिससे बीते 10 साल में यदि जनसंख्यात्मक घनत्व की दृष्टि से
कोई विसंगति उभर आई है, तो वह दूर हो जाए और समरसता पेश आए। इसी आधार पर राज्य में 2005 में
परिसीमन होना था, लेकिन 2002 में तत्कालीन मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला ने राज्य संविधान में संशोधन कर
2026 तक इस पर रोक लगा दी थी। इस हेतु बहाना बनाया कि 2026 के बाद होने वाली जनगणना के प्रासंगिक
आंकड़े आने तक परिसीमन नहीं होगा।
फिलहाल जम्मू-कश्मीर में विधानसभा की कुल 111 सीटें हैं। इनमें से 24 सीटें पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) क्षेत्र
में आती हैं। इस उम्मीद के चलते ये सीटें खाली रहती हैं कि एक न एक दिन पीओके भारत के कब्जे में आ
जाएगा। फिलहाल बाकी 87 सीटों पर चुनाव होता है। इस समय कश्मीर यानी घाटी में 46, जम्मू में 37 और
लद्दाख में 4 विधानसभा सीटें हैं। 2011 की जनगण्ना के आधार पर राज्य में जम्मू संभाग की जनसंख्या 53
लाख 78 हजार 538 है। यह प्रांत की 42.89 प्रतिशत आबादी है। राज्य का 25.93 फीसदी क्षेत्र जम्मू संभाग में
आता है। इस क्षेत्र में विधानसभा की 37 सीटें आती हैं। दूसरी तरफ कश्मीर घाटी की आबादी 68 लाख 88 हजार
475 है। प्रदेश की आबादी का यह 54.93 प्रतिशत भाग है। कश्मीर संभाग का क्षेत्रफल राज्य के क्षेत्रफल का 15.73
प्रतिशत है। यहां से कुल 46 विधायक चुने जाते हैं। इसके अलावा राज्य के 58.33 प्रतिशत वाले भू-भाग लद्दाख
में संभाग में महज 4 विधानसभा सीटें थीं, जो अब लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद विलोपित हो
जाएंगी।
साफ है, जनसंख्यात्मक घनत्व और संभागबार भौगोलिक अनुपात में बड़ी असमानता है, जनहित में इसे दूर किया
जाना, एक जिम्मेबार सरकार की जवाबदेही बनती है। परिसीमन के बाद अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए
भी सीटों के आरक्षण की नई व्यवस्था लागू हो जाएगी। फिलहाल कश्मीर में एक भी सीट पर जातिगत आरक्षण की
सुविधा नहीं है, जबकि इस क्षेत्र में 11 प्रतिशत गुर्जर बकरवाल और गद्दी जनजाति समुदायों की बड़ी आबादी
निवास करती है। जम्मू क्षेत्र में सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं, लेकिन इनमें आजादी से लेकर अब तक
क्षेत्र का बदलाव नहीं किया गया है। बहरहाल अब इन केंद्र शासित प्रदेशों में कई ऐसे बदलाव देखने में आएंगे, जो
यहां के निवासियों के लिए समावेशी होने के साथ लाभदायी भी साबित होंगे।